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महाराज शिवि कौन थे? जिन्होंने कबूतर की रक्षा के लिए बाज को अपने शरीर से काटकर मांस दिया? भक्तमाल कथा

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उशीनरके पुत्र शरणागतवत्सल महाराज शिबि यज्ञ कर रहे थे। शिबिकी दयालुता तथा भगवद्भक्तिको घ्याति पृथ्वीसे स्वर्गतक फैली थी। देवराज इन्द्रने राजाकी परीक्षा करनेका निश्चय किया। इन्द्रने बाज पक्षीका रूप धारण किया और अग्निदेव कबूतर बने। बाजके भयसे डरता, काँपता, घबराया कबूतर उड़ता आया और राजा शिबिकी गोदमें बैठकर उनके वस्त्रोंमें छिप गया। उसी समय वहाँ एक बड़ा भारी बाज भी आया। वह मनुष्यकी भाषामें राजासे कहने लगा- 'राजन्। आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं, परंतु आज यह धर्मविरुद्ध आचरण क्यों कर रहे हैं? आपने कृतघ्नको धनसे, झूठको सत्यसे, निर्दयको क्षमासे तथा दुर्जनको अपनी माधुतासे  सदा जीता है। आपने तो अपनी बुराई करनेवालेका भी उपकार ही करते हैं। जो आपका अहितकरता है उनका भी आप भला ही करना चाहते हैं; पापियोंपर भी आप दया करते है । फिर आप मुझसे मेरा आहार छीनकर अधर्म क्यों करते हैं। जो आपमें दोष हैं, उनके भी आप गुण ही देखते हैं। मैं भूखसे व्याकुल हूँ और भाग्यसे मुझे यह कबूतर आहारकेरूप में रूप में मिला है। अब आप मुझसे मेरा आहार छीन कर अधर्म क्यों कर रहे है? ' कबूतरने राजासे बड़ी कातरतासे क...

राजा अम्बरीष की कथा (The Story Of King Ambarisha) | Shri Bhaktmaal Katha | भक्ति को गौरवान्वित करती महाराजा अम्बरीष जी की पावन कथा

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 राजा अम्बरीष की कथा (The Story Of King Ambarisha) | Shri Bhaktmaal Katha | भक्ति को गौरवान्वित करती महाराजा अम्बरीष जी की पावन कथा |    Shree Hita Ambrish Ji सर्व दुःख निवारण करती है ये कथा! ||1|| Shree Hita Ambrish Ji  श्री अम्बरीषजी   वैवस्वत मनुके प्रपौत्र तथा राजर्षि नाभागके पुत्र महाराज अम्बरीषजी सप्तद्वीपवती सम्पूर्ण पृथ्वीके   वीर  स्वामी थे और उनके ऐश्वर्यकी संसारमें कोई तुलना न थी। कोई दरिद्र मनुष्य भोगों के अभावमें वैराग्यवान् बन जाय , यह तो सरल है ; किंतु धन-दौलत होनेपर , विलासभोगकी पूरी सामग्री प्राप्त रहते वैराग्यवान् होना , विषयोंसे दूर रहना महापुरुषोंके ही वशका है और यह भगवान्‌की कृपासे ही होता है । थोड़ी सम्पत्ति और साधारण अधिकार भी मनुष्यको मदान्ध बना देता है , किंतु जो भाग्यवान् अशरण-शरण दीनबन्धु भगवान्के चरणोंका आश्रय ले लेते हैं , जो उन मायापति श्रीहरिकी रूपमाधुरीका सुधास्वाद पा लेते हैं , मायाकी मादकता उन्हें रूखी लगती है। मोहनकी मोहनी जिनके प्राण मोहित कर लेती है , मायाका ओछापन उन्हें लुभानेमें असमर्थ हो जाता है । वे तो जलमे...

Raja Harishchandra Katha | Shri Bhaktmaal Katha | राजा हरिश्चंद्र कथा | कथा सागर | राजा हरिश्चद्र कथा || Raja Harishchandra Katha ||

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 Raja Harishchandra Katha | Shri Bhaktmaal Katha |  राजा हरिश्चंद्र कथा | कथा सागर | राजा हरिश्चद्र कथा || Raja Harishchandra Katha || कौन थे राजा हरिशचंद्र? | raja harishchandra ki kahani |  राजा हरिश्चंद्र को सत्यवादी और महादानी क्यों कहा जाता है? ... सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र की लोक कथा  श्रीहरिश्चन्द्रजी   सूर्यवंशमें त्रिशंकु नामके एक प्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट् हो गये हैं , जिन्हें मुनि विश्वामित्रने अपने योगबलसे सशरीर स्वर्ग भेजनेका प्रयत्न किया था । महाराज हरिश्चन्द्र उन्हीं त्रिशंकुके पुत्र थे । ये बड़े ही धर्मात्मा , सत्यपरायण तथा प्रसिद्ध दानी थे । इनके राज्यमें प्रजा बड़ी सुखी थी और दुर्भिक्ष , महामारी आदि उपद्रव कभी नहीं होते थे। महाराज हरिश्चन्द्र के यशसे त्रिभुवन भर गया । देवर्षि नारद के मुखसे इनकी प्रशंसा सुनकर देवराज इन्द्र ईर्ष्यासे जल उठे और उनकी परीक्षाके लिये मुनि विश्वामित्र से प्रार्थना की । इन्द्रकी प्रार्थनापर प्रसन्न होकर मुनि परीक्षा लेनेको तैयार हो गये ।   -  महामुनि विश्वामित्र अयोध्या पहुँचे। राजा हरिश्चन्द्र से ...

भक्त ध्रुव की कथा (Story Of Bhakt Dhruv) | Bhaktmal Katha | ध्रुव की कथा | भक्त श्री ध्रुवजी की कथा - ध्रुव चरित्र - Bhakt Dhruv Story

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 भक्त ध्रुव की कथा (Story Of Bhakt Dhruv) | ध्रुव की कथा | भक्त श्री ध्रुवजी की कथा - ध्रुव चरित्र - Bhakt Dhruv Story |    ध्रुव कोंन थे |  ध्रुव तारा की कहानी |  ध्रुव तारा की दिशा |  ध्रुव तारा कैसे बना ?  श्रीधुवजी   ध्रुव स्वायम्भुव मनुके पौत्र थे। महाराज उत्तानपादकी बड़ी पत्नी सुनीतिकी कोखसे उनका जन्म हुआ था। एक समयकी बात है , राजदरबार लगा था। महाराज उत्तानपाद अपनी छोटी रानी सुरुचि एवं उसके पुत्र उत्तमक साथ राजसिंहासनपर विराजमान थे। सुरुचिके रूप लावण्यने राजाको वशीभूत कर लिया था । सुरुचिकी रुचि ही उत्तानपादकी रुचि हो गयी थी। एक दिन पाँच वर्षका बालक ध्रुव अपने सखाओंके साथ खेलता - खेलता राजसभामें जा पहुँचा । अपने छोटे भाई उत्तमको पिताकी गोदमें बैठे देखकर बालक ध्रुवने भी पिताकी गोदमें बैठना चाहा। सुरुचि इसे कैसे सहन कर सकती थी ? सुनीतिसे उसका सौतियाडाह जो था । ' अरे , तुम्हारा इतना साहस ! यदि पिताकी गोदमें बैठना चाहते हो तो तपस्या करक...