महाराज शिवि कौन थे? जिन्होंने कबूतर की रक्षा के लिए बाज को अपने शरीर से काटकर मांस दिया? भक्तमाल कथा
उशीनरके पुत्र शरणागतवत्सल महाराज शिबि यज्ञ कर रहे थे। शिबिकी दयालुता तथा भगवद्भक्तिको घ्याति पृथ्वीसे स्वर्गतक फैली थी। देवराज इन्द्रने राजाकी परीक्षा करनेका निश्चय किया। इन्द्रने बाज पक्षीका रूप धारण किया और अग्निदेव कबूतर बने। बाजके भयसे डरता, काँपता, घबराया कबूतर उड़ता आया और राजा शिबिकी गोदमें बैठकर उनके वस्त्रोंमें छिप गया। उसी समय वहाँ एक बड़ा भारी बाज भी आया। वह मनुष्यकी भाषामें राजासे कहने लगा- 'राजन्। आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं, परंतु आज यह धर्मविरुद्ध आचरण क्यों कर रहे हैं? आपने कृतघ्नको धनसे, झूठको सत्यसे, निर्दयको क्षमासे तथा दुर्जनको अपनी माधुतासे सदा जीता है। आपने तो अपनी बुराई करनेवालेका भी उपकार ही करते हैं। जो आपका अहितकरता है उनका भी आप भला ही करना चाहते हैं; पापियोंपर भी आप दया करते है । फिर आप मुझसे मेरा आहार छीनकर अधर्म क्यों करते हैं। जो आपमें दोष हैं, उनके भी आप गुण ही देखते हैं। मैं भूखसे व्याकुल हूँ और भाग्यसे मुझे यह कबूतर आहारकेरूप में रूप में मिला है। अब आप मुझसे मेरा आहार छीन कर अधर्म क्यों कर रहे है? ' कबूतरने राजासे बड़ी कातरतासे क...